चुभता तो बहुत कुछ मुझको भी है तीर की तरह,
मगर ख़ामोश रहेता हूँ, अपनी तक़दीर की तरह|
लोग शोर से जाग जाते हैं साहब,
मुझे एक इंसान की ख़ामोशी सोने नही देती!
खामोशियाँ में शोर को सुना है मैंने,
ये ग़ज़ल गुंगुनायेगी रात के साये में।
हमे क्या पता था, आसमा ऐसे रो पडेगा,
हमने तो बस इन्हें अपनी दास्ता सुनाई थी!
ऐ जीन्दगी जा ढुंड॒ कोई खो गया है मुझ से,
अगर वो ना मिला तो सुन तेरी भी जरुरत नही मुझे|
सुनो ये बादल जब भी बरसता है,
मन तुझसे ही मिलने को तरसता है!
गर तेरी नज़र क़त्ल करने मे माहिर है तो सुन,
हम भी मर मर के जीने मे उस्ताद हो गए है|
सुनो… तुम ही रख लो अपना बना कर,
औरों ने तो छोड़ दिया तुम्हारा समझकर!!
अब ये न पूछना की... ये अल्फ़ाज़ कहाँ से लाता हूँ,
कुछ चुराता हूँ दर्द दूसरों के, कुछ अपना हाल सुनाता हूँ|
आंखों देखी कहने वाले, पहले भी कम-कम ही थे,
अब तो सब ही सुनी-सुनाई बातों को दोहराते हैं।
जब किसी से कोई गिला रखना,
सामने अपने आईना रखना।
तुम बदलो तो….कहेते हो मज़बूरीयाँ है बहोत,
और हम ज़रा सा बदले तो हम बेवफ़ा हो गए|
तेरे एहसासों में जो सुकून है,
वो नींद में कहाँ|
मेरी हर बात को उल्टा वो समझ लेते हैं,
अब के पूछा तो कह दूंगा कि हाल अच्छा है|
आ जाते हैं वो भी रोज ख्बाबो मे,
जो कहते हैं हम तो कही जाते ही नही|
मगर ख़ामोश रहेता हूँ, अपनी तक़दीर की तरह|
लोग शोर से जाग जाते हैं साहब,
मुझे एक इंसान की ख़ामोशी सोने नही देती!
खामोशियाँ में शोर को सुना है मैंने,
ये ग़ज़ल गुंगुनायेगी रात के साये में।
हमे क्या पता था, आसमा ऐसे रो पडेगा,
हमने तो बस इन्हें अपनी दास्ता सुनाई थी!
ऐ जीन्दगी जा ढुंड॒ कोई खो गया है मुझ से,
अगर वो ना मिला तो सुन तेरी भी जरुरत नही मुझे|
सुनो ये बादल जब भी बरसता है,
मन तुझसे ही मिलने को तरसता है!
गर तेरी नज़र क़त्ल करने मे माहिर है तो सुन,
हम भी मर मर के जीने मे उस्ताद हो गए है|
सुनो… तुम ही रख लो अपना बना कर,
औरों ने तो छोड़ दिया तुम्हारा समझकर!!
अब ये न पूछना की... ये अल्फ़ाज़ कहाँ से लाता हूँ,
कुछ चुराता हूँ दर्द दूसरों के, कुछ अपना हाल सुनाता हूँ|
आंखों देखी कहने वाले, पहले भी कम-कम ही थे,
अब तो सब ही सुनी-सुनाई बातों को दोहराते हैं।
जब किसी से कोई गिला रखना,
सामने अपने आईना रखना।
तुम बदलो तो….कहेते हो मज़बूरीयाँ है बहोत,
और हम ज़रा सा बदले तो हम बेवफ़ा हो गए|
तेरे एहसासों में जो सुकून है,
वो नींद में कहाँ|
मेरी हर बात को उल्टा वो समझ लेते हैं,
अब के पूछा तो कह दूंगा कि हाल अच्छा है|
आ जाते हैं वो भी रोज ख्बाबो मे,
जो कहते हैं हम तो कही जाते ही नही|

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