Thursday, 13 October 2016

2 Lines Shayari - शिकायतें...


    ऐ शेख़ मेरे पीने का अंदाज़ देख,
    अक्सर शराब में आंसू मिला के पीता हूँ|

    लोग ढूँढेंगे हमें भी,
    हाँ मगर सदियों के बाद।

    ईश्क की गहराईयो में खूब सूरत क्या है,
    मैं हूं, तुम हो, और कुछ की जरूरत क्या है!

    सच्चाई थी पहले के लोगों की जबानों में,
    सोने के थे दरवाजे मिट्टी के मकानों में!!

    मुझे मेरी माँ ने एक ही बात सिखाई है,
    बेटा कोई हाथ से छीन के लेकर जा सकता है..पर नसीब से नही|

    तुम पल भर के लिए दूर क्या जाते हो,
    तो हम ‘बिखरने’ से लगते हैं|

    देखते हैं अब क्या मुकाम आता है साहेब,
    सूखे पत्ते को इश्क़ हुआ है बहती हवा से!!

    उमर बीत गई पर एक जरा सी बात समझ में नहीं आई,
    हो जाए जिनसे महोब्बत, वो लोग कदर क्यूं नहीं करते|

    कभी किसी के जज्बातों का मजाक ना बनाना,
    ना जाने कौन सा दर्द लेकर कोई जी रहा होगा|

    खुदा का शुक्र है की ख्वाब बना दिये,
    वरना तुम्हे देखने की तो हसरत ही रह जाती।

    कुछ लोग आए थे मेरा दुख बाँटने,
    मैं जब खुश हुआ तो खफा होकर चल दिये|

    यह इनाएतें गज़ब की यह बला की मेहेरबानी,
    मेरी खेरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी|

    चलते रहेगें शायरी के दौर मेरे बिना भी,
    एक शायर के कम हो जाने से शायरी खत्म नहीं हो जाती|

    मुस्कुरा देता हूँ अक्सर देखकर पुराने खत तेरे,
    तू झूठ भी कितनी सच्चाई से लिखती थी|

    यूँ तो शिकायते आप से सैंकड़ों हैं मगर,
    आप एक मुस्कान ही काफी है मनाने के लिये।

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