Thursday, 13 October 2016

2 Lines Shayari - कैसे कह दूं...

 
    जितने वाला ही नहीं... बल्कि ‘कहाँ पे क्या हारना है’,
    ये जानने वाला भी सिकंदर होता है|

    ना पीछे मुड़ के देखो, ना आवाज़ दो मुझको,
    बड़ी मुश्किल से सीखा है मैंने अलविदा कहना!

    गिन लेती है दिन बगैर मेरे गुजारें हैं कितने,
    भला कैसे कह दूं कि माँ अनपढ़ है मेरी!

    होने वाले ख़ुद ही अपने हो जाते हैं,
    किसी को कहकर, अपना बनाया नही जाता!

    अपने हर लफ्ज़ में कहर रखते हैं हम,
    रहें खामोश फिर भी असर रखते हैं हम|

    मैं खुद भी अपने लिए अजनबी हूं,
    मुझे गैर कहने वाले.. तेरी बात मे दम है|

    जरूरी नहीं की हर बात पर तुम मेरा कहा मानों,
    दहलीज पर रख दी है चाहत, आगे तुम जानो!

    खुशबु आ रही है कहीं से ताज़े गुलाब की,
    शायद खिड़की खुली रेह गई होगी उनके मकान की।

    अगर तुम्हें यकीं नहीं, तो कहने को कुछ नहीं मेरे पास,
    अगर तुम्हें यकीं है, तो मुझे कुछ कहने की जरूरत नही!

    हुस्न वालों को क्या जरूरत है संवरने की,
    वो तो सादगी में भी क़यामत की अदा रखते हैं|

    करम ही करना है तुझको तो ये करम कर दे,
    मेरे खुदा तू मेरी ख्वाहिशों को कम कर दे।

    झूठ बोलते थे कितना, फिर भी सच्चे थे हम,
    ये उन दिनों की बात है, जब बच्चे थे हम!

    अपनी इन नशीली निगाहों को, जरा झुका दीजिए जनाब,
    मेरे मजहब में नशा हराम है|

    सारा झगड़ा ही ख्वाहिशो का है,
    ना गम चाहिए ना कम चाहिए!

    ज़ख़्म दे कर ना पूछा करो, दर्द की शिद्दत,
    दर्द तो दर्द होता हैं, थोड़ा क्या, ज्यादा क्या!!

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