यूँ बिगड़ी बहकी बातों का कोई शौक़ नही है मुझको,
वो पुरानी शराब के जैसी है,असर सर से उतरता ही नही|
तेरी तलाश में निकलू भी तो क्या फायदा,
तुम बदल गए हो.. खो गए होते तो और बात थी|
तज़ुर्बा है मेरा मिट्टी की पकड़ मजबुत होती है,
संगमरमर पर तो हमने पाँव फिसलते देखे हैं|
उस शख्स का गम भी कोई सोचे,
जिसे रोता हुआ ना देखा हो किसी ने|
जाने क्या मासूमियत है तेरे चेहरे में,
तेरे सामने आने से ज्यादा तुझे छुपके देखना अच्छा लगता है|
खुद पर भरोसे का हुनर सीख ले,
लोग जितने भी सच्चे हो साथ छोड़ ही जाते हैं|
कितनी ही खूबसूरत क्यों न हो तुम,
पर मैं जानता हूँ.. असली निखार मेरी तारीफ से ही आता है|
किसी को क्या बताये की कितने मजबूर है हम,
चाहा था सिर्फ एक तुमको और अब तुम से ही दूर है हम।
वहां तक तो साथ चलो जहाँ तक साथ मुमकिन है, जहाँ हालात बदलेंगे वहां तुम भी बदल जाना|
इन्सान सब कुछ कॉपी कर सकता हैं,
लेकिन किस्मत और नसीब नही|
कितने मज़बूर है हम तकदीर के हाथो,
ना तुम्हे पाने की औकात रखतेँ हैँ, और ना तुम्हे खोने का हौसला!
किसी की गलतियों को बेनक़ाब ना कर,
‘ईश्वर’ बैठा है, तू हिसाब ना कर।
चुभता तो बहुत कुछ मुझको भी है तीर की तरह,
मगर खामोश रहता हूँ, अपनी तकदीर की तरह|
जिस घाव से खून नहीं निकलता,
समझ लेना वो ज़ख्म किसी अपने ने ही दिया है|
अपने वजूद पर इतना न इतरा … ए ज़िन्दगी,
वो तो मौत है जो तुझे मोहलत देती जा रही है।
वो पुरानी शराब के जैसी है,असर सर से उतरता ही नही|
तेरी तलाश में निकलू भी तो क्या फायदा,
तुम बदल गए हो.. खो गए होते तो और बात थी|
तज़ुर्बा है मेरा मिट्टी की पकड़ मजबुत होती है,
संगमरमर पर तो हमने पाँव फिसलते देखे हैं|
उस शख्स का गम भी कोई सोचे,
जिसे रोता हुआ ना देखा हो किसी ने|
जाने क्या मासूमियत है तेरे चेहरे में,
तेरे सामने आने से ज्यादा तुझे छुपके देखना अच्छा लगता है|
खुद पर भरोसे का हुनर सीख ले,
लोग जितने भी सच्चे हो साथ छोड़ ही जाते हैं|
कितनी ही खूबसूरत क्यों न हो तुम,
पर मैं जानता हूँ.. असली निखार मेरी तारीफ से ही आता है|
किसी को क्या बताये की कितने मजबूर है हम,
चाहा था सिर्फ एक तुमको और अब तुम से ही दूर है हम।
वहां तक तो साथ चलो जहाँ तक साथ मुमकिन है, जहाँ हालात बदलेंगे वहां तुम भी बदल जाना|
इन्सान सब कुछ कॉपी कर सकता हैं,
लेकिन किस्मत और नसीब नही|
कितने मज़बूर है हम तकदीर के हाथो,
ना तुम्हे पाने की औकात रखतेँ हैँ, और ना तुम्हे खोने का हौसला!
किसी की गलतियों को बेनक़ाब ना कर,
‘ईश्वर’ बैठा है, तू हिसाब ना कर।
चुभता तो बहुत कुछ मुझको भी है तीर की तरह,
मगर खामोश रहता हूँ, अपनी तकदीर की तरह|
जिस घाव से खून नहीं निकलता,
समझ लेना वो ज़ख्म किसी अपने ने ही दिया है|
अपने वजूद पर इतना न इतरा … ए ज़िन्दगी,
वो तो मौत है जो तुझे मोहलत देती जा रही है।
No comments:
Post a Comment