Thursday, 13 October 2016

2 Lines Shayari - इंसान...

 
    इंसान बुलबुला है पानी का जी रहे हैं कपडे बदल बदल कर,
    एक दिन एक ‘कपडे’ में ले जायेंगे कंधे बदल बदल कर।

    सपने तो बहुत आये पर, तुमसा कोई सपनों मे न आया,
    फिजा मे फूल तो बहुत खिले पर, तुमसा फूल न मुसकुराया|

    रोने की वजह न थी हसने का बहाना न था,
    क्यो हो गए हम इतने बडे इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था|

    हीरों की बस्ती में हमने कांच ही कांच बटोरे हैं,
    कितने लिखे फ़साने फिर भी सारे कागज़ कोरे है।

    बेगुनाह कोई नहीं, सबके राज़ होते हैं,
    किसी के छुप जाते हैं, किसी के छप जाते हैं।

    आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,
    कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक|

    उसे रास ही ना आया मेरा साथ वरना,
    मैं उसे जीते जी ख़ुदा बना देता|

    गिरा दे जितना पानी है तेरे पास ऐ बादल,
    ये प्यास किसी की लेने से बुझेगी तेरे बरसने से नहीं|

    इतनी चाहत तो लाखो रुपए पाने की भी नही होती,
    जितनी बचपन की तस्वीर देख कर बचपन में जाने की होती हैं|

    मैं नींद का शोकीन ज्यादा तो नही,
    लेकिन तेरे ख्वाब ना देखूँ तो.. गुजारा नही होता!!

    तुझे मुफ्त में जो मिल गए हम,
    तु कदर ना करे ये तेरा हक़ बनता है।

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