हर रिश्ते मे सिर्फ नूर बरसेगा,
शर्त बस इतनी है कि रिश्ते में शरारतें करो साजिशें नहीं।
मिठास रिश्तों की बढाए तो कोई बात बने,
मिठाईयाँ तो हर साल मीठी ही बनती है|
फरिश्ते आकर उनके जिस्म पर खुशबू लगाते थे,
वो बच्चे रेल के डिब्बों में अब झाडू लगाते हैं|
जब मिलो किसी से तो जरा दूर का रिश्ता रखना,
बहुत तङपाते हैँ अक्सर सीने से लगाने वाले|
वहम से भी अक्सर खत्म हो जाते हैं कुछ रिश्ते,
कसूर हर बार गल्तियों का नही होता|
बड़े अजीब से हो गए रिश्ते आजकल,
सब फुरसत में हैं पर वक़्त किसी के पास नही|
कैसा सितम है आपका ये, की रोने भी नही देता,
करीब आते नहीं और खुद से जुदा होने भी नहीं देता।
ये ना पूछ कितनी शिकायतें हैं तुझसे ऐ ज़िन्दगी,
सिर्फ इतना बता की तेरा कोई और सितम बाक़ी तो नहीं|
पंखों को खोल कि ज़माना सिर्फ उड़ान देखता है,
यूँ जमीन पर बैठकर, आसमान क्या देखता है|
गिरते हुए आँसुओं को कौन देखता है,
झूठी मुस्कान के दीवाने हैं सब यहाँ।
सुनो! या तो मिल जाओ, या बिछड जाओ,
यू सासो मे रह कर बेबस ना करो|
कागज अपनी क़िस्मत से उड़ता है और पतंग अपनी काबिलियत से,
क़िस्मत साथ दे या न दे पर काबिलियत जरुर साथ देगी|
“जान” थी वो मेरी,
और जान तो एक दिनचली ही जाती है ना!!
सुनो, एकदम से जुदाई मुश्किल है,
मेरी मानों कुछ किश्तें तय कर लो|
ये जो तुम मेरा हालचाल पूछते हो,
बड़ा ही मुश्किल सवाल पूछते हो|
शर्त बस इतनी है कि रिश्ते में शरारतें करो साजिशें नहीं।
मिठास रिश्तों की बढाए तो कोई बात बने,
मिठाईयाँ तो हर साल मीठी ही बनती है|
फरिश्ते आकर उनके जिस्म पर खुशबू लगाते थे,
वो बच्चे रेल के डिब्बों में अब झाडू लगाते हैं|
जब मिलो किसी से तो जरा दूर का रिश्ता रखना,
बहुत तङपाते हैँ अक्सर सीने से लगाने वाले|
वहम से भी अक्सर खत्म हो जाते हैं कुछ रिश्ते,
कसूर हर बार गल्तियों का नही होता|
बड़े अजीब से हो गए रिश्ते आजकल,
सब फुरसत में हैं पर वक़्त किसी के पास नही|
कैसा सितम है आपका ये, की रोने भी नही देता,
करीब आते नहीं और खुद से जुदा होने भी नहीं देता।
ये ना पूछ कितनी शिकायतें हैं तुझसे ऐ ज़िन्दगी,
सिर्फ इतना बता की तेरा कोई और सितम बाक़ी तो नहीं|
पंखों को खोल कि ज़माना सिर्फ उड़ान देखता है,
यूँ जमीन पर बैठकर, आसमान क्या देखता है|
गिरते हुए आँसुओं को कौन देखता है,
झूठी मुस्कान के दीवाने हैं सब यहाँ।
सुनो! या तो मिल जाओ, या बिछड जाओ,
यू सासो मे रह कर बेबस ना करो|
कागज अपनी क़िस्मत से उड़ता है और पतंग अपनी काबिलियत से,
क़िस्मत साथ दे या न दे पर काबिलियत जरुर साथ देगी|
“जान” थी वो मेरी,
और जान तो एक दिनचली ही जाती है ना!!
सुनो, एकदम से जुदाई मुश्किल है,
मेरी मानों कुछ किश्तें तय कर लो|
ये जो तुम मेरा हालचाल पूछते हो,
बड़ा ही मुश्किल सवाल पूछते हो|
No comments:
Post a Comment