कदमो को रुकने का हुनर नहीं आया,
सभी मंजिले निकल गयी पर घर नहीं आया|
चुपचाप चल रहे थे.. हम अपनी मंजिल की तरफ,
फिर रस्ते में एक ठेका पड़ा.. और हम गुमराह हो गए।
एक रास्ता ये भी है मंजिलों को पाने का,
कि सीख लो तुम भी हुनर हाँ में हाँ मिलाने का।
मैं कड़ी धुप में चलता हु इस यकींन के साथ,
मैं जलूँगा तो मेरे घर में उजाले होंगे|
कुछ इसलिये भी ख्वाइशो को मार देता हूँ,
माँ कहती है घर की जिम्मेदारी है तुझ पर|
काश तेरा घर मेरे घर के बराबर होता,
तू न आती तेरी आवाज तो आती रहती|
बहुत ज़ालिम हो तुम भी मुहब्बत ऐसे करते हो,
जैसे घर के पिंजरे में परिंदा पाल रखा हो|
उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं,
क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं|
पहले ज़मीं बाँटी फिर घर भी बँट गया,
इनसान अपने आप मे कितना सिमट गया|
ये जो छोटे होते है ना दुकानों पर होटलों पर और वर्कशॉप पर,
दरअसल ये बच्चे अपने घर के बड़े होते है|
मंज़िलों से गुमराह भी कर देते हैं कुछ लोग,
हर किसी से रास्ता पूछना अच्छा नहीं होता|
मन्जिले मुझे छोड़ गयी रास्तों ने सभाल लिया है,
जा जिन्दगी तेरी जरूरत नहीं मुझे हादसों ने पाल लिया है|
कौन कहता है मुसाफिर जख्मी नही होते,
रास्ते गवाह हैं कम्बख्त गवाही नही देते।
दो रास्ते जींदगी के, दोस्ती और प्यार,
एक जाम से भरा, दुसरा इल्जाम से|
सच के रास्ते पे चलने का.. ये फ़ायदा हुआ,
रास्ते में कहीं भीड़ नहीं थी।
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