तेरा नजरिया मेरे नजरिये से अलग था,
शायद तूने वक्त गुजारना था और हमे सारी जिन्दगी|
अजीब किस्सा है जिन्दगी का,
अजनबी हाल पूछ रहे हैं और अपनो को खबर तक नहीं|
तेरा नज़रिया मेरे नज़रिये से अलग था,
शायद तुझे वक्त गुज़ारना था और मुझे जिन्दगी!
कुछ तो है जो बदल गया जिन्दगी में मेरी,
अब आइने में चेहरा मेरा हँसता हुआ नज़र नहीं आता|
माना के सब कुछ पा लुँगा मै अपनी जिन्दगी मै,
मगर वो तेरे मैहदी लगे हाथ मेरे ना हो सकेंगे|
ना छेड़ किस्सा वोह उल्फत का बड़ी लम्बी कहानी है,
मैं जिन्दगी से नहीं हारा किसी अपने की मेहरबानी है|
उसने चुपके से मेरी आँखों पर हाथ रखकर पूछा…बताओ कौन?
मैं मुस्कराकर धीरे से बोला... “मेरी जिन्दगी”|
एक ही समानता है…पतंग औऱ जिन्दगी में,
ऊँचाई में हो तब तक ही ‘वाह – वाह’ होती है।
सिखा दी बेरुखी भी ज़ालिम ज़माने ने तुम्हें,
कि तुम जो सीख लेते हो हम पर आज़माते हो।
तकलीफें तो हज़ारों हैं इस ज़माने में,
बस कोई अपना नज़र अंदाज़ करे तो बर्दाश्त नहीं होता!!
ख्वाहिश-ए-ज़िंदगी बस इतनी सी है अब मेरी,
कि साथ तेरा हो और ज़िंदगी कभी खत्म न हो।
बचपन में तो शामें भी हुआ करती थी,
अब तो बस सुबह के बाद रात हो जाती है!
ऊपर वाले ने कितने लोगो की तक़दीर सवारी है,
काश वो एक बार मुझे भी कह दे के आज तेरी बारी है|
मुजे ऊंचाइयों पर देखकर हैरान है बहुत लोग,
पर किसी ने मेरे पैरो के छाले नहीं देखे|
किनारों से मुझे ऐ नाख़ुदा दूर ही रखना,
वहाँ ले कर चलो, तूफ़ान जहां से उठने वाला हैं।
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